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कैमूर में औद्योगिक क्षेत्र के लिए जमीन अधिग्रहण के कारण किसान मायूस।बच्चों के भविष्य हेतु है चिंतित।

October 02, 2026 | रिपोर्टर: परवेज़ खान
चाँद/चैनपुर /​कैमूर:बिहार के कैमूर जिले में प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र के निर्माण को लेकर जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होते ही किसानों में गहरा आक्रोश फैल गया है। आरोप है कि स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग बिना किसानों की जानकारी या सहमति के गुपचुप तरीके से सर्वे और कागजी कार्रवाई को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। इस परियोजना के दायरे में पांच मौजों की लगभग 781 एकड़ उपजाऊ व सिंचित भूमि आ रही है।  
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बिना जनसुनवाई और सहमति के सर्वे का आरोप
​स्थानीय किसानों और ग्रामीणों का कहना है कि पिछले करीब एक साल से प्रशासनिक स्तर पर जमीन चिह्नित करने और उसका आंतरिक ब्योरा तैयार करने का काम चल रहा है। हाल ही में जब अधिकारियों और पटना से आई टीम ने धरातल पर प्रक्रिया तेज की, तब जाकर लोगों को इसकी भनक लगी। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि प्रशासन ने न तो कोई सार्वजनिक नोटिस जारी किया और न ही प्रभावित होने वाले किसानों, बटाईदारों या खेतिहर मजदूरों के साथ कोई बैठक कर उनकी सहमति ली।  
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गांवों के चारों तरफ की घेराबंदी से भविष्य पर संकट
​प्रस्तावित योजना के तहत कुतुबनपुर, मोरवां, कुरई, करजी और गेहुआं मौजे की जमीनें शामिल हैं। किसान रविशंकर सिंह के अनुसार, कुतुबनपुर और मोरवां जैसे आपस में जुड़े गांवों की चौतरफा जमीन इस दायरे में ली जा रही है। इससे गांव चारों तरफ से औद्योगिक क्षेत्र से घिर जाएंगे, जिससे न केवल गांवों का भविष्य का विस्तार रुक जाएगा, बल्कि आबादी के लिए खुला वातावरण और खेती दोनों छिन जाएंगे।  
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रोजगार के नाम पर छलावा और पुनर्वास की अनदेखी
​किसानों ने प्रशासन के रोजगार देने के दावों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि:  
​०  औद्योगिक इकाइयों में तकनीकी और कुशल पदों के लिए बाहर के लोगों को प्राथमिकता दी जाती है।  
०  ​स्थानीय किसान और खेतिहर मजदूर केवल मजदूरी तक सीमित रह जाएंगे, जबकि खेती उनकी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की स्थायी आजीविका है।  
०  ​परियोजना में भूमिहीन मजदूरों और बटाईदारों के लिए मुआवजे या पुनर्वास का कोई ठोस खाका नहीं बनाया गया है।  
"​बिहटा जैसे अन्य औद्योगिक क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए किसानों ने कहा कि वहां वर्षों बाद भी जमीनें खाली पड़ी हैं और उद्योग धरातल पर नहीं उतरे।"  
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बाजार भाव से कई गुना कम सर्किल रेट पर ऐतराज
​मुआवजे की गणना को लेकर भी असंतोष गहरा है। किसानों का कहना है कि 2013 के पुराने सर्किल रेट के आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है, जबकि वर्तमान में जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य सरकारी दर से 10 से 12 गुना अधिक है। ऐसी स्थिति में नियमों के तहत दिया जाने वाला चार गुना मुआवजा भी किसानों के लिए भारी घाटे का सौदा है।  
​पठारी व अनुपजाऊ भूमि पर उद्योग लगाने की मांग
​किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने इस संबंध में जिलाधिकारी को औपचारिक असहमति पत्र सौंपते हुए मांग की है कि बहुफसली, सिंचित और उपजाऊ भूमि को उजाड़ने के बजाय अधौरा या भगवानपुर प्रखंड के पठारी व गैर-कृषि क्षेत्रों में उद्योग स्थापित किए जाएं। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण जबरन किया गया, तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।  
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